अष्टावक्र महागीता, भाग दो - Ashtavakra Mahagita, Vol.02: युग बीते पर सत्य न बीता, सब हारा पर सत्य न हारा (Hindi Edition)

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Artikelnummer 237269208 Erscheinungsdatum 2026/07/10 Listenpreis €1.04 Modellnummer 237269208
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अष्टावक्र-संहिता के सूत्रों पर प्रश्नोत्तर सहित पुणे में हुई सीरीज के अंतर्गत दी गईं 91 OSHO Talks में से 10 (11 से 20) OSHO Talks दुख का मूल द्वैत है ‘दुख का मूल द्वैत, उसकी औषधि कोई नहीं।’ इससे तुम थोड़े चौंकोगे भी, घबड़ाओगे भी। क्योंकि तुम बीमार हो और औषधि की तलाश कर रहे हो। तुम उलझे हो और कोई सुलझाव चाहते हो। तुम परेशानी में हो, तुम कोई हल खोज रहे हो। तुम्हारे पास बड़ी समस्याएं हैं, तुम समाधान की तलाश कर रहे हो। इसलिए तुम मेरे पास आ गए हो। और अष्टावक्र की इस गीता में जनक का उदघोष है कि औषधि कोई नहीं! इसे समझना। यह बड़ा महत्वपूर्ण है। इससे महत्वपूर्ण कोई बात खोजनी मुश्किल है। और इसे तुमने समझ लिया तो औषधि मिल गई। औषधि कोई नहीं, यह समझ में आ गया, तो औषधि मिल गई। जनक यह कह रहे हैं कि बीमारी झूठी है। अब झूठी बीमारी का कोई इलाज होता है? झूठी बीमारी का इलाज करोगे तो और मुश्किल में पड़ोगे। झूठी बीमारी के लिए अगर दवाइयां लेने लगोगे, तो बीमारी तो झूठ थी; लेकिन दवाइयां नई बीमारियां पैदा कर देंगी। इसलिए पहले ठीक-ठीक निर्णय कर लेना जरूरी है कि बीमारी सच है या झूठ? ओशो अनुक्रम 11 दुख का मूल द्वैत है 12 प्रभु-प्रसाद--परिपूर्ण प्रयत्न से 13 जब जागो तभी सवेरा 14 उद्देश्य--उसे जो भावे 15 जीवन की एकमात्र दीनता: वासना 16 धर्म है जीवन का गौरीशंकर 17 परीक्षा के गहन सोपान 18 विस्मय है द्वार प्रभु का 19 संन्यास का अनुशासन: सहजता 20 क्रांति: निजी और वैयक्तिक अष्टावक्र महागीता, भाग दो संसार में हमारा असली सवाल एक ही है कि हमने जन्मों-जन्मों में कुछ अभ्यास कर लिए हैं। कुछ गलत बातें हम ऐसी प्रगाढ़ता से सीख गए हैं कि अब उन्हें कैसे भूलें, यही अड़चन है। यह बात हमने खूब गहराई से सीख ली है कि मैं शरीर हूं। भाषा, समाज, समूह, संस्कार सब इसी बात के हैं। भूख लगती है, तुम कहते हो: मुझे भूख लगी है। जरा सोचो, अगर तुम इस वाक्य को ऐसा कहो कि शरीर को भूख लगी है, ऐसा मैं देखता हूं--तुम फर्क समझते हो कितना भारी हो जाता है? तुम कहते हो, मुझे भूख लगी, तो तुम घोषणा कर रहे हो कि मैं देह हूं। जब तुम कहते हो शरीर को भूख लगी, ऐसा मैं देखता हूं, जानता हूं--तो तुम यह कह रहे हो कि शरीर मुझसे अलग, मैं ज्ञाता हूं, द्रष्टा हूं, साक्षी हूं। जब कोई तुम्हें गाली देता है और तुम्हारे मन में तरंगें उठती हैं, तो तुम कहते हो, मुझे क्रोध हो गया, तो तुम गलत बात कह रहे हो। तुम इतना ही कहो कि मन क्रोधित हो गया, ऐसा मैं देखता हूं। तुम मन ही नहीं हो; वह जो मन में क्रोध उठ रहा है, उसको देखने वाले हो। अगर तुम मन ही होते तब तो तुम्हें पता ही नहीं चल सकता था कि मुझे क्रोध हो गया है, क्योंकि तुम तो क्रोध ही हो गए होते; पता किसको चलता? अगर तुम शरीर ही होते तो तुम्हें कभी पता नहीं चलता कि भूख लगी है, क्योंकि तुम तो भूख ही हो गए होते; पता किसको चलता? पता चलने के लिए तो थोड़ा फासला चाहिए। शरीर को भूख लगती है, तुमको पता चलता है। शरीर में भूख लगती है, तुममें पता चलता है। तुम सिर्फ बोध-मात्र हो। अगर हमारी भाषा ज्यादा वैज्ञानिक और धार्मिक हो, अगर हमारे संस्कार चैतन्य की तरफ हों, शरीर की तरफ नहीं, तो बड़ी अड़चनें कम हो जाएं। ‘अनंत समुद्ररूप मुझमें चित्तरूपी हवा के शांत होने पर जीवरूप वणिक के अभाग्य से जगतरूपी नौका नष्ट हो जाती है।’ और जब यह चित्तरूपी हवा शांत हो जाती है, लहरें खो जाती हैं और चेतना की झील मौन हो जाती है, तो फिर जीवरूप वणिक की नौका विनष्ट हो जाती है। जगतपोतः विनश्वरः! फिर इस जगत का जो पोत है, यह जो जगत की नाव है, यह तत्क्षण खो जाती है। जैसे एक स्वप्न देखा हो! जैसे कभी न रही हो! जैसे बस एक खयाल था, एक भ्रम था! तो करना है एक ही बात कि यह जो चित्त की हवा है, यह शांत हो जाए। इस संबंध में अष्टावक्र और जनक की दृष्टि बड़ी क्रांतिकारी है, जैसा मैं बार-बार कह रहा हूं। योग कहेगा कि कैसे इस चित्त की हवा को शांत करो। वह प्रक्रिया बताएगा--चित्तवृत्ति निरोधः! वह कहेगा योग है: चित्तवृत्ति का निरोध। तो कैसे चित्त की वृत्ति का निरोध करें?--यम करो, नियम करो, संयम करो; आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार करो; धारणा, ध्यान, समाधि करो। तो फिर चित्त की लहरें शांत हो जाएंगी। ओशो Read more

ASIN B07BSN41YN
ISBN13 978-0880508872
Language Hindi
File size 1.4 MB
Page Flip Enabled
Publisher OSHO Media International
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Print length 306 pages
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Publication date March 28, 2018
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